शनिवार, 11 जून 2016

8 SIGNS YOU’RE WITH SOMEONE WHO RESPECTS YOU

A good relationship is all about respecting the thoughts and ideas of your partner. If you want your relationship to be a healthy one, there must be mutual respect. Everyone deserves to enjoy their ideas and thoughts without someone interfering with them, yes everyone deserves to be respected. Who would want to be in a relationship where they aren’t valued? We have listed below a few signs that would tell you how much your partner values you.

1) ACTIVELY SEEKS YOUR OPINION:

Your opinion would matter to them and they will always ask for your opinion before making any decisions, either in their life or relationship. Whatever problem they are in, you would be the person they come to for advice. He/She would listen to what you have to say, they would listen very carefully and will respond to it. If your partner listens to what you have to say, it sure means he respects your ideas. It is a sign of respect.

2) THEY WON’T GET JEALOUS:

Jealousy the official killer of the relationship, if your partner doesn’t get jealous when you go out to spend some time with someone else. It sure means he/she respects you and he/she respects your freedom to spend time as you wish. This is only possible if your partner has trust in you. They would give you the freedom to go anywhere you like on your own, even if there are going to be other guys there. If your partner understands that it’s important to spend time apart, it’s only because they respect the relationship that you two share.

3) THEY WON’T HIDE ANYTHING FROM YOU:

They would never hide anything from you, even if they think you might disapprove. They would open up to you, even if they are worried about what your response will be. They would surely share anything and everything that you want to know about them, even his past. He/She will be open with you about every single thing. And it is possible only if they have respect and trust to you and to the relationship.

4) HONESTY:

We all know honesty is the best policy. Do you think your partner is honest with you? If your partner respects you they will not try to shield any information from you. They would never lie to you, in fact, they won’t feel the need to hide anything from you. There will be no secrets in the relationship, they would even tell you about their ex. If there are no secrets in your relationship, it sure means that you are with someone who really respects you.

5) They Would Motivate You:

What else do you need to realize that your partner respects you? They want to see you succeed and will encourage you to take risks. They would believe in you and they would know that you could handle yourself. Even if you want to do something that us unimaginable, they’d tell you to go for it. And you may succeed in completing the task and even if you don’t, they know you can handle it. And if you can’t they will be there for you always to catch you before you fall. If your partner encourages you, it’s because he respects the relationship and also trusts you.

6) They Will Respect Your Viewpoint:

They would respect your individuality and your right to have your own viewpoints, even if it’s completely opposite to his. It doesn’t bother them, even if you don’t share the same opinion. He/She will listen to it patiently and would never try to change your opinion. If your partner appreciates the differences in opinions as much as the similarities, it sure proves he is in love with you. And he respects your viewpoints.

7) Privacy:

Many relationships fail due to lack of privacy, is your partner stalking you on Facebook? Does your partner look at your phone for messages when you are not nearby? Do they get jealous when you are speaking to someone? If your partner respects your decisions without any question, he/she is the one. They love you and respect the relationship and wouldn’t question your privacy. If they really respect your relationship they would allow you to make your own decisions without any interference from them.

8) Doing Things Together:

A relationship doesn’t work unless both of them work things together. And if your partner really loves you for who you are, they would share your burdens and happiness with them. They would want you to be with them in every single aspect of their life. And they would be willing to do every single task
together, no matter how big or small the task may be they will be ready to offer their help to you anytime and anywhere. It’s only possible if they respect you and your relationship.


Source – IheartIntelligence
By Milen Raychev

बुधवार, 4 मई 2016

कर्म का फल तो भुगतना ही पड़ता है

यह घटना एक ऐसी लड़की से जुड़ी है जिसे न मैंने कभी देखा और न ही कभी उसकी आवाज़ ही सुनी। लेकिन वह मेरे लिए अन्‍जानी नहीं है। कुछ साल पहले वह मुझे ढूंढ़ती हुई मेरे पास आई थी। पता नहीं किसने उसे मेरा ई-मेल पता दिया था। किसने उसे मेरे विषय में बताया था...मुझे नहीं मालूम। उस समय वह एक गंभीर समस्‍या लेकर मेरे पास आई थी। वह किसी लड़के से प्रेम करती थी और उससे शादी करना चाहती थी। लेकिन लड़का यह कह कर शादी से इनकार कर रहा था कि वह अपने घरवालों की इच्‍छा के विरुद्ध नहीं जा सकता। ज़ाहिर है वह किसी चमत्‍कार की उम्‍मीद लेकर ही आई थी। लेकिन चमत्‍कार अगर इनसान की इच्‍छा के अनुरुप होने लगे तो वह चमत्‍कार कैसा। उसने मुझसे अपनी समस्‍या बताई, तो मैंने सीधे शब्‍दों में कह दिया कि तुम्‍हारे प्रयास में कमी है। तुम अपने और उस लड़के के घरवालों से बात करो। मैं इसमें कुछ मदद नहीं कर सकता। उसने ऐसा कुछ नहीं किया होगा यह मैं जानता हूं। वह लगातार मुझसे एक ही बात करती। लेकिन मैं हर बार उसे एक ही जवाब देता- जिसे तुम्‍हारी फि़क्र नहीं तुम उसके लिए क्‍यों जान देती हो। मेरी बातों का उस पर कोई असर नहीं होता था। वह बस एक ही रट लगाए बैठी थी... मेरे साथ ऐसा क्‍यों हो रहा है। एक दिन उसने बताया कि उस लड़के ने किसी दूसरी लड़की के साथ शादी कर ली। मैंने कहा कि वह तुम्‍हारे साथ कभी गंभीर रहा ही नहीं। अगर ऐसा होता तो वह कोई न कोई रास्‍ता ज़रूर निकालता। बहरहाल, लड़की का वही राग... मेरे साथ ही ऐसा क्‍यों?

कई बार समझाने के बावजूद जब उसका रोना-धोना जारी रहा तब मैंने उससे कहा- मेरी सलाह का तुम पर कोई असर नहीं है। तुम उस पर अमल ही नहीं करती तो व्‍यर्थ मेरा समय नष्‍ट मत किया करो। आखि़री बार तुम्‍हें आगे बढ़ने का रास्‍ता बता रहा हूं। इसके बाद दोबारा मेरे पास मत आना। वह माफ़ी मांगने लगी। कहने लगी- नाराज़ मत होइये सर। मुझे आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। लेकिन मैं उसे भूल नहीं पा रही हूं। मैं आपको परेशान नहीं करूँगी। बस इसी बात पर मुझे उस पर दया आ जाती थी। किसी के बिछड़ने की पीड़ा बहुत कष्‍टदायी होती है। ख़ासकर जब उससे बेहद प्रेम हो, तब तो जीवन ही तहस-नहस हो जाता है। वह लड़की महीने-दो महीने पर एक बार ई-मेल जरूर करती थी। कभी मैं उसे अनदेखा कर देता, कभी बात कर लिया करता था।

लगभग एक साल बाद उसने एक बार फिर वही सवाल किया। इस बार उसने वादा किया कि वह आखि़री बार यह सवाल पूछ रही है। अगर मेरे जवाब से वह संतुष्‍ट हो गई तो दोबारा नहीं पूछेगी। साथ ही, उसने विश्‍वास जताया कि उसके सवालों के जवाब सिर्फ़ मेरे पास ही हैं। उसके भरोसे का आधार क्‍या था, यह मैं नहीं जानता। फिर भी मैंने उससे कहा- ठीक है। मुझे नहीं मालूम... इसका जवाब मैं तुम्‍हें कब दूंगा। जवाब ज़रूर मिलेगा, लेकिन इसमें वक्‍़त लगेगा। उसने कहा- ठीक है सर। मैं इंतज़ार करूंगी।

एक दिन की बात है। दिग्‍पाल के साथ मैं लोदी कॉलोनी गया था। वहां उसे कोई काम था। मैंने कहा- जब तक तुम्‍हारा काम नहीं हो जाता, मैं साई मंदिर में ही रहूंगा। गुरुवार का दिन था। मैं मंदिर में गया तो उस समय दोपहर की आरती हो रही थी। मैं उसमें शामिल हुआ। इसके बाद भजन गायकों की एक मंडली आई और भजन कार्यक्रम शुरू हो गया। मुझे बहुत अच्‍छा लगा रहा था। अचानक उस लड़की का ध्‍यान आया और मैंने सोचा कि थोड़ी देर ध्‍यान लगा लेता हूं। दिमाग़ बिल्‍कुल शांत हो चुका था। मन में कोई विचार नहीं था। इसलिए इतने शोर में भी बड़ी सहजता से ध्‍यान लग गया। मैं कितनी देर तक उस अवस्‍था में रहा यह नहीं बता सकता। कमर में हल्‍का दर्द शुरू हुआ तब ध्‍यान टूटा। जितनी देर ध्‍यान में बैठा, उसमें मैंने जो देखा वह उस लड़की के सवालों के ही जवाब थे। ऐसा लगा जैसे मैं कोई फिल्‍म देख रहा हूं। मुझे बहुत आश्‍चर्य हुआ। वैज्ञानिक दिमाग़ तुरन्‍त ही सवाल उठाने लगा... यह तो ख्‍याली खिचड़ी है। कोई किसी का अतीत कैसे देख सकता है? लेकिन जब हर सवाल का जवाब मिलता गया तब मैंने पाया कि यह ख्‍याली खिचड़ी दिमाग ने नहीं पकाई है, बल्कि किसी और दिशा से आई है।

ध्‍यान में मैंने जो कुछ देखा वह इस प्रकार था-
मैंने पानी का एक बड़ा सा स्रोत देखा जो किसी नदी या समुन्‍दर जैसा विशाल था। लेकिन यह पहाड़ पर था और वह इलाका शर्तिया तौर पर हिमाचल प्रदेश था। क्‍योंकि मुझे वहां से चंडीगढ़ काफ़ी नज़दीक लगा। उसके बाद एक जमीन का टुकड़ा देखा जो ऊंचाई पर तो था, लेकिन आसपास पहाड़ों से घिरा था। ज़मीन के तीन तरफ खाई थी। देखा एक नौजवान खेत में काम कर रहा है। थोड़ी देर बाद एक लड़की रोटी-सब्‍जी लेकर आई और उसे खाने के लिए दिया। लड़की को देखकर लगता था कि वह किसी सम्‍पन्‍न घर की है। लड़की थोड़ी सहमी और चौकन्‍नी सी लग रही थी। अचानक वहां एक व्‍यक्ति आया जिसकी उम्र लगभग 45 साल रही होगी। सफेद शर्ट और सफेद पैन्‍ट में था वह। कंधे पर गमछा या कुछ और था। उसने लड़की को खींच कर उस लड़के को जोर से मारा। उसे बहुत पीटा। लड़की के मुँह से विरोध का एक स्‍वर तक नहीं निकला। वह लड़की का हाथ पकड़ कर ले जाने लगा और लड़की ने भी विरोध नहीं किया। बस जाते समय वह पीछे खेत में पड़े उस लड़के को देखती रही।

गर्मी के दिन थे। बिजली भी नहीं थी। मैं छत पर बैठा हुआ था। तभी मन में ख्‍याल आया कि उस लड़की से कुछ पूछा जाए। अगर उसका जवाब ध्‍यान में दिखे दृश्‍य से थोड़ा सा भी मेल खाएगा तो मैं उसे बता दूंगा जो कुछ मैंने देखा। मैंने उससे जो सवाल पूछे वह इस प्रकार थे-
पहाड़ से तुम्‍हारा कोई रिश्‍ता है?
तुम्‍हारा घर हिमाचल प्रदेश में है?
तुम्‍हारे घर से थोड़ी दूर कोई बॉंध है?
वह कोई बड़ा सा डैम है?
जिस लड़के से प्रेम करती थी वह क्‍या समृद्ध है?
उसके मुकाबले तुम्‍हारी आर्थिक स्थिति अभ्‍ाी काफ़ी कमज़ोर होगी।
वह मैदानी इलाके कहा है, जहां खेत ही खेत हैं मतलब वह जगह पंजाब है।

लड़की का जवाब इस प्रकार था (शब्‍दों का हेरफेर संभव है, लेकिन मजमून यही था)-
- जी हॉं। हम पहले हिमाचल प्रदेश में ही रहते थे। लेकिन काफ़ी साल पहले दूसरी जगह चले आए। हमारा घर है वहॉं, लेकिन कम ही जाना होता है।
- हां सर। भाखड़ा डैम है। हम नंगल में रहते थे।
- वह अच्‍छे घर से है। उसके पास काफ़ी ज़मीन और धन सम्‍पत्ति है। मेरी स्थिति जैसा आपने कहा, बिल्‍कुल सही है। वह पंजाब में रहता है।

उसने पू्छा- आप यह सब क्‍यों पूछ रहे हैं?
- बताता हूं। मैंने कहा- तुम्‍हारे सवालों के जवाब मिल गए हैं। अब तुम विश्‍वास करो या न करो। लेकिन मेरे हिसाब से यह सही जवाब है।
- मुझे विश्‍वास है सर। आपसे सही जवाब ही मिलेगा। आपने मेरे बारे में इतना तो बता दिया। पहले भी बहुत कुछ बताया है।
मैंने कहा- देखो... कहानी कुछ इस तरह है। यह तुम्‍हारा दूसरा जन्‍म है। पहले जन्‍म में तुम एक सम्‍पन्‍न शख्‍स के यहां जन्‍मी थी जिसके पास काफ़ी ज़मीन थी। समाज में उसका रसूख था। तुम्‍हारे यहॉं एक नौकर था जो घर और खेत में काम करता था। तुम उससे प्रेम करती थी। लेकिन तुम्‍हारे पिता को यह बात पसंद नहीं थी। उन्‍होंने उस लड़के को एक बार बहुत मारा पीटा और अधमरा कर खेत में छोड़ दिया। तुम उसके लिए खेत में खाना लेकर गई थी। उसी समय तुम्‍हारे पिताजी वहां आ गए थे। जब तुम्‍हारे पिता उसे बेरहमी से पीट रहे थे तब तुमने उसके लिए हमदर्दी का एक शब्‍द तक मुँह से नहीं निकाला। वह तुमसे कहता रहा कि एक बार तुम कहो तो कि तुम क्‍या चाहती हो। फिर भी तुमने कुछ नहीं कहा।

इसका मतलब यह कि उस समय तुम अपने परिवार के खि़लाफ़ नहीं गई और उस लड़के को तड़पता और बिलखता छोड़ गई। इस जन्‍म में उस लड़के का बदला पूरा हो गया। अब वह तुमसे बहुत ज्‍यादा सम्‍पन्‍न है और तुम्‍ासे शादी के लिए कोई प्रयास नहीं किया। पिछले जन्‍म में वह तुम्‍हारे लिए पागल था। इस जन्‍म में तुम उसके लिए। इसलिए हिसाब बराबर। अब तुम्‍हें उसका ख्‍़याल छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए। उसने कहा- अब कोई चारा भी नहीं है। उसके अधिकांश जवाब संक्षिप्‍त होते हैं, लेकिन मुझे उसकी मनोदशा का पता तुरंत लग जाता है। जब ज्‍यादा नकारात्‍मकता का आभास होता है तो मैं उसे जवाब ही नहीं देता। जब उसके सभ्‍ाी सवालों के जवाब उसे मिल गए तो उसने बात करना भी बहुत कम कर दिया। लंबे अंतराल पर कभी-कभी किसी अवसर पर संक्षिप्‍त ई-मेल करती है।

जूतोपचार

चार-पॉंच साल पहले की बात है। मेरे एक मित्र ने दो बच्चियों को गोद लिया। दोनों सगी बहनें हैं। एक बच्‍ची की गोद लेने की प्रक्रिया 2006 में ही पूरी हो गई थी। हालांकि वह दोनों को घर ले आई थीं। लेकिन एक की प्रक्रिया कागजी कार्रवाई में लटकी हुई थी। इसके लिए उन्‍हें बार-बार शिमला से लुधियाना जाना पड़ता था। समस्‍या यह थी कि एक अधिकारी ने उस बच्‍ची को गोद लेने के लिए जो शर्तें रखी थीं वह कुछ अव्‍यवहारिक था। अधिकारी का कहना था कि बच्‍ची के नाम कुछ फिक्‍स्‍ड डिपॉजिट और संपत्ति का कुछ हिस्‍सा करो तभी यह संभव होगा। इससे पहले ही वह बड़ी बच्‍ची के नाम फ्लैट कर चुकी थीं। अब एफडी और संपत्ति मिलाकर 10-15 लाख दूसरी बच्‍ची के नाम करना था। जो उनके लिए संभव नहीं था। वह काफी घबराई हुई थीं कि पता नहीं क्‍या होगा। उन्‍होंने मुझसे कहा कि कुछ कीजिए ताकि दोनों बच्चियां मेरे पास ही रहें। मैंने वादा कर दिया कि काम हो जाएगा। अगले दिन उन्‍हें लुधियाना जाना था। लिहाजा रात को ही मैंने उनका काम बनाने की कोशिश की।
मैंने ध्‍यान लगा कर उस अधिकारी को देखा जो धनवन्‍तरी सी इकहरी काया का स्‍वामी था। लेकिन खडूस दिखता था। मैंने उसके समक्ष गया और छूटते ही जमकर धुनाई की। मुझे नहीं मालूम ऐसा क्‍यों हुआ। फिर उससे कहा, साले तेरा दिमाग खराब है? कभी देख कर आ दोनों बच्चियों की परवरिश कैसी हो रही है। दोनों शिमला के अच्‍छे स्‍कूल में पढ़ती हैं और उनकी हर सुख-सुविधा का ख्‍याल रखा जाता है। यह कैसा नियम है कि एक तो परोपकार करो... ऊपर से पूरी तरह कंगाल बन जाओ! काम आज ही हो जाना चाहिए। वरना अभी ट्रेलर था। पूरी फिल्‍म दिखाते देर नहीं लगेगी। मैंने देखा कि उसने काम कर दिया।
अगले दिन मोहतरमा गईं तो उनका काम पलक झपकते ही हो गया। उसने फ्लैट में तीनों को हिस्‍सेदार बना दिया। फिक्‍स्‍ड डिपॉजिट की रक़म भी कम कर दी थी। यानी कुल मिलाकर उनका काम पॉंच लाख के आसपास में ही हो गया। मैंने कहा था कि वहां कुछ अजीब सी घटना भी घटेगी, क्‍योंकि मैंने इस काम में जिस शक्ति की मदद ली है वह काम पूरा होने तक वहीं रहेगी। वह अधिकारी के कमरे से निकल कर आई तो एक सज्‍जन उन्‍हें साईं बाबा की तस्‍वीर पकड़ा गए। किसी दफ्तर में ऐसा होनो थोड़ा अटपटा लगा। कुछ लोग इसे बक़वास कहेंगे। मैं पहले ही कह चुका हूं कि अघ्‍यात्‍म, ध्‍यान, तंत्र-मंत्र जैसी पराज्ञान की बातें उनके लिए नहीं हैं। बहरहाल, मोहतरमा का काम हो गया था तो वह बहुत खुश थीं। ऊपर से साईं महाराज उनके पास आ गए थे तो वह अभिभूत थीं।
आलेख में तारीख का जिक्र नहीं किया गया है, क्‍योंकि अब यह मुझे याद नहीं। साल कौन सा था, वह भी याद नहीं। संभवत: 2011 का आखि़री या 2012 की शुरुआत की बात है। दिन, महीना और साल मित्र ही बता सकती हैं। मैं इन बातों को लिखना तो नहीं चाहता था, लेकिन लिख रहा हूं क्‍योंकि यह शोध का विषय है कि ऐसा कैसे होता है? इसमें दो महत्‍वपूर्ण बातें हैं। पहला यह कि मैं दिल्‍ली में ही था, लेकिन पारगमन विधि से उस अधिकारी के पास पहुंचा जिसे मैंने न तो कभी देखा था और न ही उस जगह से वाकि़फ़ था जहां वह बैठता था। दूसरी बात यह कि काम कराने का तरीक़ा हिंसात्‍मक था। सबसे बड़ी बात यह कि काम का सम्‍पादित हो जाना। संयोग बार बार नहीं हो सकते। निश्चित रूप से यह संयोग नहीं है, लेकिन क्‍या है? Astral travel के बारे में हम सबने सुना है। किस तरह पुराने समय में ऋषि-मुनि पलक झपकते ही एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर पहुंच जाते थे। इस पर प्रयोग हुए हैं और इसका निष्‍कर्ष यह निकला कि ऐसा सम्‍भव है। मैं निष्‍कर्ष तक पहुँचने वाली संस्‍था का नाम नहीं लिख रहा हूँ।

मंगलवार, 3 मई 2016

ऊर्जा दिमाग की बत्‍ती भी बुझा सकती है!

7 अक्‍तूबर, 2014 को मैं अपने मित्र के साथ मयूर विहार में एक सज्‍जन के घर गया। वे मेरे मित्र के परिचित हैं। महाशय अच्‍छे पद पर तैनात हैं। उनका बेटा पुणे में मर्चेंट नेवी की पढ़ाई कर रहा था। किसी बात पर एक दिन उसने अपने सहपाठी और रूम पार्टनर को पीट दिया तो संस्‍थान प्रबंधन ने दण्‍ड स्‍वरूप उसे कुछ समय के लिए घर भेज दिया। साथ ही, कहा कि किसी मनोचिकित्‍सक से उसकी काउंसलिंग कराने के बाद ही दस्‍तावेजों के साथ उसे दोबारा भेजें। बेटे के भविष्‍य को लेकर उसके माता पिता बहुत चिंतित थे। मुझे ख़ासतौर से उनके पास ले जाया गया था।
हम सभी एक हॉल में बैठे थे। मैं एक सोफे पर, मेरी बायीं तरफ मित्र और उनके सामने सज्‍जन। सज्‍जन की दायीं ओर प्‍लास्टिक की कुर्सी पर 20 साल का उनका बेटा, उसकी दायीं तरफ यानी सज्‍जन के ठीक सामने उनकी श्रीमति और उनकी दायीं तरफ अर्थात् मेरे मित्र के बायी ओर बिल्‍कुल बगल में उनकी बेटी। सज्‍जन कभी तेलुगु तो कभी अंग्रेजी में बात कर रहे थे। सभी बातों में मशगूल थे और मैं उस लड़के को देख रहा था। लड़का मुझे थोड़ा अलग लगा। सभी बातचीत में व्‍यस्‍त थे। तभी मैंने कहा- लड़का मानसिक तौर पर शांत नहीं है। इसका दिमाग अति सक्रिय है। यानी रेस्‍टलेस माइंड। इतना सुनने के बाद लड़का जो आराम से टेक लगा कर बैठा हुआ था...एकदम से जैसे उसमें स्‍फूर्ति आ गई और वह सीधे होकर बैठ गया। जैसे फिल्‍म में कोई रोमांचक दृश्‍य आने वाला हो। मैंने आगे कहा, इसकी नींद कभी पूरी नहीं होती होगी। चूंकि इसका दिमाग हर समय कुछ न कुछ सोचता रहता है, इसलिए जब भी सो कर उठता होगा, उसे ताज़गी नहीं महसूस होती होगी। अब बच्‍चा पूरी तरह भौचक इलाहाबादी टाइप मुझे देखने लगा। उसे देखकर लग रहा था कि अपने बारे में किसी अनजान व्‍यक्ति से वह जो कुछ सुन रहा है, वह क़तई ग़लत नहीं। आश्‍चर्य होना लाजि़मी था। कुछ समय पहले तक इस लड़के के लिए मैं किसी ऐरे गैरे से ज्‍यादा नहीं था। अब तक जो मुझे संशय भरी निगाहों से देख रहा था, अब उसकी निगाह में विस्‍मय के भाव स्‍पष्‍ट झलक रहे थे। मैंने उसे इशारे से अपने पास बुलाया। कमरे में अब पूरी तरह सन्‍नाटे का साम्राज्‍य स्‍थापित हो चुका था। बच्‍चे ने एक पल की भी देरी नहीं की और उठकर मेरे पास आ गया। मैंने अपने सोफे दायीं ओर एक के ऊपर एक करके रखी हुई प्‍लास्टि की सफेद कुर्सी पर बैठने को कहा। लड़के ने उसमें से एक कुर्सी हटाई और बैठ गया। मैं सोफे से उठा और लडके के सामने वाली प्‍लास्टिक की सफेद कुर्सी पर बैठ गया। मैंने उसे आराम से बैठने को कहा। फिर कुछ देर तक उसे देखता रहा। मुझे इसका बिल्‍कुल भी अहसास नहीं हुआ कि इन सब में कितना वक्‍त़ लगा, क्‍योंकि उस हॉल में अब कोई नहीं था। ध्‍यान की अवस्‍था ही ऐसी होती है। मुझे पता ही नहीं चला कि लोग कब उठकर वहां से चले गए। यह सोचकर कि मेरे कार्य में कोई व्‍यवधान न हो। सभी दूसरे कमरे में चले गए थे।
मैं उस बच्‍चे को जो कहता, वह उसे करता। जैसे वह सम्‍मोहन की अवस्‍था में हो। जितनी देर में मैंने उसे जाना, उसके मुताबिक उस बच्‍चे से उसकी इच्‍छा के विरूद्ध कोई भी कुछ नहीं करा सकता। बाद में उसे माता-पिता ने भी यह बात मानी कि मैं बिल्‍कुल सही कह रहा हूं। बालक मेरी आज्ञा का अक्षरश: पालन करता जा रहा था। इसके बाद मैं खड़ा हो गया। कुछ पल ध्‍यान लगाने के बाद उस पर दोनों हाथों से ऊर्जा फेंकने लगा। मेरी आँखें बंद थीं। अमूमन मैं जब किसी की हीलिंग करता हूं तो उसे शांत और आराम की मुद्रा में बैठकर ऑंखें बंद करने को कहता हूं। लेकिन यहां उल्‍टा था। मैंने उस बच्‍चे को ऐसा करने को इसलिए नहीं कहा कि वह ऐसा करेगा ही नहीं। यह बच्‍चा आध्‍यात्मिक रूप से मुझे जागृत लगा। उसके मन में एेसे कई सवाल उमड़ते हैं जिनके जवाब न तो उसके पास हैं और न ही वह किसी से पूछता है। मुझे तो उसे कुछ अहसास कराना था जिससे कि वह मेरी बात मानने की स्थिति में हो। क्‍योंकि मॉं-बाप और शिक्षक तो पहले ही हाथ खड़े कर चुके थे। मैंने उस पर अंधाधुंध जितनी ऊर्जा फेंकी, इससे पहले उतना क्‍या उसका दस फीसदी भी किसी को नहीं दिया होगा। मैं अपने काम में खोया हुआ था। इस बीच मुझे अहसास हुआ, जैसे लड़का विस्‍मय से मुझे देख रहा है। देखा तो वाकई वह विस्‍मय भरी निगाह से मुझे देख रहा था। उसे लगा यह पागल आदमी पता नहीं क्‍या कर रहा है, वगैरह वगैरह।
अब मैं उसके सामने बैठा था। मैंने पूछा- कुछ महसूस हो रहा है?
- हाँ
- क्‍या?
-‍ ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने बॉंध दिया है मुझे।
- और क्‍या लग रहा है?
- जैसे सैकड़ों चीटियां हाथ-पैर पर दौड़ रही हैं।
मैंने कहा- दिमाग़ काम कर रहा है?
- नहीं
- कुछ सोचने की कोशिश करो...
- नहीं सोचा जा रहा। ... बिल्‍कुल खाली है। मेमरी लॉस तो नहीं हुई न?
मैं हँसा। घबराओ मत। मेमरी सही सलामत है, बस बकवास चीज़ें डिलीट हो गईं हैं।
- ठीक है। अब खड़े हो जाओ।
लड़का खड़ा हो गया। मैंने कहा- चल सकते हो?
उसने कहा- मैं तो खड़ा भी नहीं हो पा रहा।
मैं जोर से हँसा। अब विस्‍मय और भय का मिलाजुला भाव उसके चेहरे पर उभर कर आ रहा था। मैंने कहा- वहाँ जब कुर्सी पर बैठे हुए थे तब तो मुझे पोपट लाल समझ रहे थे। अब क्‍या हुआ? उसने झेंपते हुए कहा- नहीं...यू आर ग्रेट!
- बड़ी जल्‍दी विचार बदल गए तुम्‍हारे!
-अापने मेरे साथ क्‍या किया है? लगभग मुस्‍कुराते हुए मासूमियत से उसने पूछा।
- बेटा जादू किया है? अब इसी तरह रहो।
उसने कहा- मुझे अच्‍छा लग रहा है। लेकिन मैं पहले की तरह होना चाहता हूं।
मैंने कहा- डरो मत। थोड़ी देर में पहले जैसे ही हो जाओगे। अभी तुम्‍हारे पर इतनी ऊर्जा है कि तुम खु़द को ही सम्‍भाल नहीं पाओगे। अभी सबकुछ अजीब सा लगेगा तुम्‍हें।
- हां, वैसा ही लग रहा है.... पर अच्‍छा लग रहा है। अन्‍दर शांति है। खुशी भी महसूस हो रही है।
मैंने जब उसके बारे में उसे और बताया तो वह एक आदर्श बच्‍चे की तरह व्‍यवहार करने लगा।
इससे ज्‍यादा और कुछ नहीं लिखूँगा, क्‍योंकि वह न तो बच्‍चे और न ही उसके माता-पिता के लिए भी ठीक नहीं। अस्‍तु उस बच्‍चे में आध्‍यात्म के प्रति रुचि है। उसे सही मार्गदर्शन मिले तो वह बहुत कम समय में काफी प्रगति कर सकता है। वह हर किसी को महत्‍व नहीं देता। शुरू में मुझे भी ऐंवें ही समझा, लेकिन बाद में जब उसे अहसास हुआ कि नहीं... यहां मामला उसकी कल्‍पना से भी परे है तो समर्पण कर दिया।
बाद में मैंने बच्‍चे और उसके पिता से कहा कि जब भी तुम मुझसे बात करना चाहो, फोन कर सकते हो। तुम्‍हारी मदद करूँगा। उस समय तो दोनों बाप-बेटों ने हॉं-हॉं कहा, लेकिन उस दिन के बाद एक बार भी बच्‍चे के बारे में नहीं बताया। मसलन उसे समय पर नींद आने लगी। उसका मन शांत है। पेट की गड़बड़ी नहीं है। गुस्‍से पर फ़र्क़ पड़ा है। यह भ्‍ाी नहीं बताया कि मैंने कहा था कि वह हॉस्‍टल के उसी कमरे में दोबारा जाएगा, लेकिन उसमें उसका रूम पार्टनर नहीं होगा। वह अपने मन से यह डर निकाल दे कि उसे हॉस्‍टल से निकाल दिया जाएगा। जब मैंने यह शिकायत मित्र के पिता जी से की तब सज्‍जन ने एक दिन फ़ोन करके बताया कि उनका बेटा हॉस्‍टल चला गया है। दूसरे लड़के को अलग कमरे में शिफ्ट कर दिया गया है। जब उन्‍होंने फोन किया तो मैंने कह दिया- मैं ऐसे लोगों की मदद नहीं करता जो फीडबैक देना भी मुनासिब नहीं समझते। उसके बाद मेरी उनसे कभ्‍ाी बात नहीं हुई। कभी-कभी सोचता हूं कि बच्‍चे से बात करूँ, लेकिन यह सोचकर नहीं करता कि कहीं लोग यह न सोच लें कि मैं उनके बच्‍चे को साधु-संन्‍यासी बना दूँगा... जैसे कि मैं लकड़ी सुँघा कर बहलाकर ले जाने वाला कोई औघड़ या साधु हूं।

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

चमत्‍कार क्‍या ऐसे होते हैं?

अभी कुछ दिनों पहले मेरी एक मित्र से बात हो रही थी। वह अपने पति के साथ Seattle में रहती हैं। Seattle अमेरिका के ख़ूबसूरत शहरों में से एक है। यहां अमेजन डॉट कॉम और माइक्रोसॉफ्ट जैसी प्रौद्योगिकी क्षेत्र की दिग्‍गज कंपनियों का मुख्‍यालय है। यह पहाड़, सदाबहार घने जंगल और जल से घिरा एक बेहतरीन शहर है। इसके अलावा इमराल्‍ड सिटी जो कि वास्‍तव में हज़ारों एकड़ में फैला एक मैदान है।
दिलचस्‍प बात यह कि मैं न तो इनसे और न ही इनके पति से कभी मिला। इनसे परिचय भी किसी दिलचस्‍प कहानी से कम नहीं है। छोडि़ये...काम की बात करते हैं। दरअसल अमेरिका में काम करने के लिए work Permit लेना पड़ता है। मोहतरमा को कुछ महीने पहले ही नई नौकरी मिली थी। लेकिन करीब दो महीने पहले इनके  work permit की मियाद पूरी हो गई और उन्‍हें नए permit के लिए आवेदन करना पड़ा। समस्‍या यह थी कि इसमें वक्‍़त लग रहा था। कुछ दिन पहले उनसे बात हुई तो बताया कि अगले दिन आव्रजन दफ्तर जाना है, permit का पता करने। मेरे मुँह से निकल गया कि जब दफ्तर पहुँच जाओ तो मैसेज करना। उस समय मैं दफ्तर में था। उनके पति का मैसेज आया कि वे लोग दफ्तर पहुँच चुके हैं। मैं ध्‍यान लगा कर उनका काम आसान करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन इसी बीच एक साथ कई काम सामने आ गए। लगा जैसे कि कोई जानबूझ कर मुझे भटकाने आ गया। यह सब हंगामा सिर्फ पॉंच-सात मिनट के लिए ही हुआ। इतने में वे लोग बाहर भी आ गए। उस दिन बड़ा अफ़सोस हुआ कि बनता काम बिगड़ गया। शायद ऐसा इसलिए हुआ कि वह सही वक्‍़त नहीं था। अभी एक हफ्ता पहले उनसे फिर बात हुई। पता चला कि उनके permit का कोई पता ठिकाना ही नहीं है। मैंने कहा कि मैं एक बार कोशिश कर के देखूंगा। उनसे बात करते करते ही मैंने ध्‍यान लगाया और एक दो मिनट की मोहलत माँगी। फिर मुझे जो करना था किया और उनसे कहा। 24 अप्रैल को मंजूरी मिल जाएगी। लेकिन हस्‍ताक्षर करने वाले ने महीना कौन सा लिखा यह देखना भूल गया। दिमाग़ में एक ख्‍़याल आया कि कहीं यह मई का महीना न हो। इस तरह के काम में यदि ध्‍यान भटका तो काम होने से रहा। लेकिन मोहतरमा ने बड़ी विनम्रता से कहा... कोई बात नहीं। आपने कोशिश तो की। परन्‍तु मैं तो ठहरा जि़द्दी। मैंने कहा.. अजी ऐसे कैसे छोड़ देंगे। मैं फिर से देखता हूं महीना कौन सा है। इसके बाद ध्‍यान में मैंने फिर से सब ठीक किया। फिर उनसे पूछा. 26 को कौन सा वार यानी दिन है? उन्‍होंने कहा- मंगलवार। फिर मेरे मुँह से निकला यानी उस दिन आप दफ्तर जाएंगी। मतलब यह कि उनके आवेदन पर अधिकारी का हस्‍ताक्षर 24 अप्रैल को होना था और उन्‍हें 26 तक इसकी सूचना मिलनी थी। उन्‍हें काम हो जाने की सूचना 26 अप्रैल को ही मिली। मैंने उनसे कहा था कि अगर आपका काम मेरे बताए दिन पर हो जाए तो मुझे ज़रूर बताइयेगा, क्‍योंकि अपने काम पर शक करना मेरी आदत है। लिहाजा उन्‍होंने हमारी बातचीत के अंश, अपने शुक्रिया, मेहरबानी, नवाजि़श वाले मेल में चिपका कर भेज दिया। इसलिए पारदर्शिता दिखाते हुए उसे ज्‍यों का त्‍यों मैंने भी ब्‍लॉग पर चिपका दिया।
दरअसल, मैं थोड़ा कन्‍फ्यूज्‍ड इस बात को लेकर हूं कि यह कोई दैवीय शक्ति है जो मेरा आदेश मानती है या मेरी मानसिक शक्ति है। इस मानसिक शक्ति से मैं किसी से कुछ भी करा सकता हूं? बहरहाल, अभी और बहुत से प्रयोग होंगे। इसके बाद निष्‍कर्ष निकलेगा कि यह सब होता कैसे है? यह एक बार की बात होती तो कह सकता था कि इसका पैटर्न अमुक है। लेकिन यह कई बार हो चुका है फिर भी हर बार कोई न कोई सवाल खड़ा हो ही जाता है।
 

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Namaste ji, mera EAD card aa jayega shortly :)

Nagarjuna ji,
I am so happy my work permit is arriving. It is like getting a job offer again. 
More than that, am happy that I have used the time at hand, enjoyed it a bit. :) Thanks to your advice, and support. It was because of your advice, and constant support that I was not negative. Your voice and conversations gave me so much of support. I can not express myself adequately, and thank you from the bottom of my heart. 

I was surprised, about the accuracy of the date you predicted, here is our conversation that we had when you predicted the date:
[12:57 PM, 4/20/2016] Nagarjuna Singh: Main usefir se correct karaunga
[12:58 PM, 4/20/2016] vaishali: Agar aapse hoga to dekhiye nahi to intezar karoongi
[12:59 PM, 4/20/2016] Nagarjuna Singh: Ho to jana chahiye. Aj tak fail nahi hua hun
[1:00 PM, 4/20/2016] vaishali: Haan 😊
[1:00 PM, 4/20/2016] vaishali: Yay
[1:00 PM, 4/20/2016] vaishali: Mujhe vishwas hai
[1:01 PM, 4/20/2016] Nagarjuna Singh: 26th kaun sa war h
[1:01 PM, 4/20/2016] Nagarjuna Singh: Yani din kya h
[1:01 PM, 4/20/2016] vaishali: Tuesday
[1:01 PM, 4/20/2016] Nagarjuna Singh: Ok
[1:02 PM, 4/20/2016] Nagarjuna Singh: Yani us din office jana h

When I first checked the status, I prayed and thanked Sai baba and Mahavatar babaji, and was all the time amazed at the correctness of your prediction. :) . Many many blessings and thanks to you. You are my ideal. I want to at least be as pure as you, and make someone else feel, the same way that you are making me feel. I do not know if that is possible or not, but I want to spread it. I cannot believe that you are so accurate and pray that you may achieve the ultimate perfection, the highest state of consciousness and be bliss. Om Namah Shivaya.
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vaishali

00:05 (2 hours ago)


to me

क्‍या आत्‍मा की हीलिंग सम्‍भव है?

अभी मैं जिस घटना के बारे में जि़क्र करने जा रहा हूं, वह मेरे बाल सखा की अर्द्धांगिनी की है। इस ब्‍लॉग पर मैं यह सब इस लिए नहीं लिख रहा कि मैं प्रसिद्धि का भूखा हूं। मेरे पास ऐसे कई हुनर हैं जिनसे मैं आसानी से लोकप्रिय हो सकता हूं। मैं तो बस सत्‍य और जीवन के रहस्‍यों को समझने में लगा हुआ हूं जो मुझे शांति देती है। मेरी तलाश यही शांति है जिसे मैं काफ़ी हद तक प्राप्‍त कर चुका हूं। 
मुझे इस बाल सखा का नाम लेने में कोई संकोच नहीं है, क्‍योंकि वह मेरे हृदय के बहुत क़रीब है। लगभग एक साल पहले मुझे अरविंद ने बताया कि उसकी पत्‍नी को कैंसर हो चुका है और गुड़गांव (अब गुरुग्राम) के एक बड़े अस्‍पताल में एक साल से इलाज चल रहा है। यह दुर्भाग्‍य ही है कि मैं उसकी पत्‍नी को एकबार भी नहीं देख सका। लगभग पाँच-छह माह पहले की बात है। एक दिन उसने मुझे फोन किया। पूछा- तुम्‍हारा घर कहॉं है? मुझे लगता है कि तुम्‍हारे घर के आसपास ही हूं। मैंने पता बता दिया तो वह आ भी गया। घर आकर उसने बताया कि वह अब आयुर्वेद और होम्‍योपैथ डॉक्‍टर से पत्‍नी की बीमारी का इलाज करा रहा है। बड़े अस्‍पताल के डॉक्‍टर जवाब दे चुके थे। बातों-बातों में उसने हीलिंग के बारे में पूछा। मेरा ब्‍लॉग पढ़कर ही उसे पता चला कि मैं हीलिंग करता हूं। उसने एक मासूम सवाल किया.. क्‍या यह देख कर बता सकते हो कि मेरी पत्‍नी कैसी है?  मैंने एक पल के लिए ध्‍यान लगाया और बता दिया कि वह कैसी हैं और आने वाले समय में उनके स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार दिखेगा। अस्‍तु, ऐसा ही हुआ। मुझे तब बहुत ख़ुशी हुई थी। अचानक तीन-चार महीने पहले उन्‍हें फिर से अस्‍पताल में भर्ती कराना पड़ा। उसने मुझे हीलिंग के लिए कहा। मैं यथा संभव उनकी हीलिंग करता रहा। इसी तरह एक दिन हीलिंग के दौरान मैंने पाया कि उनके शरीर में कैंसर का फैलाव फेफड़े तक होने को है। अरविंद से पूछा तो उसने भी यही कहा कि डॉक्‍टर का भी यही कहना है। उपाय क्‍या है फिर? मैंने कहा कि मैं कुछ बैक्‍टीरिया शरीर में डालता हूं जो कैंसर वाले बैक्‍टीरिया को मार देगा। उसकी इज़ाज़त मिलने के बाद मैंने इस प्रक्रिया पर काम शुरू कर दिया। लेकिन हीलिंग के दौरान यह सीधे पेट वाले हिस्‍से से नहीं जाकर सिर से पूरे शरीर में जाने लगा। तब मैं चकरा गया... ऐसा क्‍यों हो रहा है? मैंने अरविंद को बताया तो उसने कहा, Spine से यह दिमाग तक पहुंच गया है। मैंने दो-तीन दिन तक इसका असर देखा। पर कोई ख़ास फ़र्क पड़ता नहीं दिखा। मैंने पाया कि उन्‍हें हीलिंग से फायदा नहीं हो रहा है। पता नहीं क्‍यों मेरा भी मन हीलिंग करने को नहीं होता था। शायद पहले वाली घटना से आशंकित था। इसके बाद अरविंद जब मुझसे हीलिंग के लिए कहता तभी मैं करता था। एक दिन मैंने उससे कहा कि हीलिंग से कोई फायदा नहीं होगा। भाभी की soul healing करके देखता हूं। उस हीलिंग के दौरान मैंने जो अनुभव किया उसे अरविंद को अवगत कराया। उसने कहा कि मेरा अनुभव यथार्थ के बिल्‍कुल करीब है। वस्‍तुत: मैंने पाया कि अरविंद की पत्‍नी की आत्‍मा एक बच्‍चे की तरह व्‍यवहार करती है। इसका मतलब यह कि उस आत्‍मा की यह पहली यात्रा ही थी। इस आधार पर मैंने जो बातें कही, वह सही थी। जैसे उनका व्‍यवहार, बात करने का तरीका, व्‍यक्तित्‍व आदि-इत्‍यादि। मैंने कहा, उनकी आत्‍मा की हीलिंग कर के देखता हूं। लेकिन इसके दो परिणाम होंगे- पहला यह कि वह बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ हो सकती हैं। दूसरा, उनकी स्थिति बिगड़ सकती है! (जो शरीर त्‍यागने की दिशा में कदम होगा) कोष्‍ठक वाली बात मैंने उसे नहीं बताई। उसने कहा, जो कर सकते हो करो। मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। मैंने soul healing की तो एक-दो दिन बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई। इसके बाद बिगड़ती ही चली गई। इसके बाद मैं अपने काम में व्‍यस्‍त हो गया। कुछ दिन पहले से उसकी लगातार बहुत याद आ रही थी, लेकिन मैं उसे फोन नहीं कर पा रहा था। करीब 15 दिन पहले उसका मैसेज आया। तब मैंने पूछा- तुम्‍हारी बहुत याद आ रही थी। सब ठीक है न। इसके बाद जो जवाब आया, वह एक बड़ा सन्‍नाटा छोड़ गया। भाभी का देहान्त 15-20 दिन पहले हो चुका था।
इस घटना ने एक और सवाल मेरी तरफ़ उछाल दिया। क्‍या soul healing हीलिंग से जीव को शरीर के बन्‍धन से मुक्‍त किया जा सकता है? क्‍या उसे इस बात के लिए प्रेरित किया जा सकता है कि जब आगे जीवन दिखता ही नहीं तो शरीर को कष्‍ट क्‍यों देना? कर्म और फल का खेल ख़त्‍म करो। किसी की soul healing से एक बात का पता तो चल ही जाता है कि उसका स्‍वभाव कैसा है। कई मामलों में मैंने पाया कि इनसान दोहरा जीवन व्‍यतीत कर रहा है। उसका व्‍यक्तित्‍व कुछ और होता है, जबकि आत्‍मा चाहती कुछ और है। ऐसे लोगों में मैंने डिप्रेशन भी पाया। मेरे इर्द-गिर्द ऐसे कई लोग हैं, जिन्‍होंने अपनी ख़ूबियों के बारे में नहीं बताया, लेकिन soul healing और उससे बात करके मैं उनकी वास्‍तविकता के विषय में जान गया। ऐसे कई लोग हैं जिनके विषय में मुझे मालूम है कि उनका लक्ष्‍य क्‍या है। उन्‍हें बताया भी, फिर भी वह जड़ की तरह वहीं जमे हुए हैं। शायद सही वक्‍़त अभी नहीं आया।
बहरहाल, अरविंद के जीवन में एक बड़ा शून्‍य आ गया है, लेकिन मुझे विश्‍वास है कि वह इससे सही तरीके से निपट लेगा। वह बहुत ही Positive इनसान है।
अन्‍त में दिवंगत की आत्‍मा का नया सफ़र आसान हो, यही कामना है। उसे उसका लक्ष्‍य मिले ताकि उसे इस जन्‍म और मरण के बन्‍धन से मुक्ति मिल जाए।


हीलिंग में कितनी ताकत है?

हीलिंग में क्‍या इतनी ताकत/शक्ति होती है कि देहधारी को मृत्‍यु के आग़ोश में जाने से रोक सके? एक हीलर होने के नाते मेरा यह पूछना शायद इस पद्धति पर प्रश्‍न चिह्न लगाने के समान होगा। लेकिन विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते यह सवाल स्‍वाभाविक है। गणित ने मुझे तर्क करना सिखाया और विज्ञान ने प्रश्‍न उठाना। ईश्‍वर है या नहीं... इस पर कुछ शोध भी हुए हैं। इसमें पाश्‍चात्‍य देशों के बुद्धिजीवी इस निष्‍कर्ष पर पहुंचे कि ईश्‍वर नहीं है,लेकिन ब्रह्माण्‍ड में एक ऐसी ऊर्जा है जो पूरी सृष्टि को संचालित करती है। सर्न में लार्ज हेड्रन कोलाइडर के प्रयोग का मकसद भी एक तरह से ईश्‍वर के होने का पता लगाना ही था।
बहरहाल, सवाल यह है कि क्‍या ईश्‍वरीय शक्ति यानी कॉस्मिक एनर्जी यानी प्राण शक्ति से जीव (आत्‍मा) को शरीर में रहने के लिए बाध्‍य किया जा सकता है? कुछ समय पूर्व की एक घटना से लगातार मेरे मन में यह सवाल उठ रहा है, लेकिन इसका जवाब नहीं मिल रहा। अलबत्‍ता हीलिंग की एक दूसरी घटना जरूर इस रहस्‍य को और बढ़ा रही है। इसलिए सबसे पहले कुछ माह पूर्व की उसी घटना का जिक्र करूंगा। यदि कोई इस घटना से उपजे सवालों पर प्रकाश डाल सके तो मुझ अकिंचन पर बहुत बड़ा उपकार होगा।
जब कभी भी मेरे मन में यह विचार आया कि हीलिंग नहीं करूंगा, क्‍योंकि इसके कुछ साइड इफेक्‍ट्स तो होते ही हैं। जिसे हर बार मैंने महसूस किया है। लेकिन फैसला लेने के बाद हर बार कुछ पेचीदे केस मेरे पास आए और हर बार किसी न किसी रहस्‍य से परदा उठा।
मेरे एक अंकल हृदय रोग से पीडि़त थे। एक पांच सितारा अस्‍पताल में उनका इलाज चल रहा था, लेकिन मैं अस्‍पताल के इलाज के तौर-तरीकों से संतुष्‍ट नहीं था। हालांकि दुर्भाग्‍यवश्‍ा मैं उस दौरान एक बार भी उनसे मिलने नहीं गया। लेकिन ध्‍यान लगाने पर डॉक्‍टरों की लापरवाही साफ दिखती थी। उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी, लेकिन डॉक्‍टर कुछ नहीं कर रहे थे। आखि़रकार उन्‍हें एक अन्‍य निजी अस्‍पताल में ले जाया गया। वहां पता चला कि उनके फेफड़े में संक्रमण फैल गया है। इलाज शुरू हुआ, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। लगातार मुझसे हीलिंग के लिए कहा जा रहा था। ख़ुद अंकल का भी मुझ पर बहुत भरोसा था। एक दिन की बात है। उस दिन हीलिंग के दौरान मुझे जो महसूस हुआ, वैसा पहले कभी भी नहीं हुआ। मैं उनकी हीलिंग कर रहा था। उस समय उनकी सांसें डूब रही थीं और धड़कन भी बहुत कम थी। हीलिंग के दौरान मेरा पूरा शरीर ठण्‍डा पड़ने लगा। इसमें कोई शक नहीं कि उस समय कड़ाके की ठण्‍ड पड रही थी और मैं नहाने जाने वाला ही था। तभी हीलिंग के लिए कहा गया था। चूंकि उस समय शर्ट नहीं पहना हुआ था, इसलिए लगा शायद ठण्‍ड लगने की वजह यही रही होगी। लेकिन दूसरे ही पल अहसास हुआ कि मैं तो मुश्किल से ही स्‍वेटर पहनता हूं। इससे ज्‍़यादा ठण्‍ड में भी बिल्‍कुल ठण्‍डे पानी से ही नहाता हूं। घर में तो कभी स्‍वेटर पहनता ही नहीं चाहे कितनी भी ठण्‍ड रहे, क्‍योंकि शरीर को अहसास ही नहीं होता कि ठण्‍ड लग रही है। गर्मी में भी यही हालत रहती है, बस ऑंखों पर धूप से लगता है कि गर्मी अधिक है। अगर धूप का चश्‍मा लगा हो तो लगता है बादल छाए हुए हैं और गर्मी से परेशानी नहीं होती।
चूंकि मुझे ठण्‍ड अधिक लग रही थी और हाथ-पैर बिल्‍कुल ठण्‍डे पड़ चुके थे। शरीर भी बुरी तरह कांप रहा था। मैं कम्‍बल ओढ़ कर बैठा और हीलिंग के लिए ध्‍यान लगाने लगा। लेकिन पाया कि मेरी हीलिंग का कोई असर नहीं हो रहा है। तब मैंने Ascendant Masters से हीलिंग में मदद मांगी। तत्‍काल 7 Masters अंकल के इर्द-गिर्द गोला बनाकर खड़े दिखे। वे जो ऊर्जा दे रहे थे उसे मैं साफ देख रहा था। इन 7 masters में से दो से तो मैं भली-भॉंति अवगत हूं। तीसरे master के बारे में डॉक्‍टर कौशिक गुप्‍ता से पता चला, जो फ्रांस में रहते हैं। यह उनके गुरू थे। ख़ैर... कुछ देर हीलिंग करने के बाद मैंने अपने सखा को मैसेज किया कि अब कोई फायदा नहीं है। बचने की उम्‍मीद नहीं दिख रही। लेकिन अपनों के बारे में कोई भी यह स्‍वीकार नहीं कर पाता कि वह उसे छोड़कर जाने वाला है। सखा ने भी मुझसे कहा कि हीलिंग करते रहो। लिहाजा मैं करता रहा। Masters के सहयोग से अंकल को artificial life support पर रखा। (एक विचित्र संयोग अभी मैंने डॉ: गुप्‍ता का जिक्र किया और उनका फोन आ गया। दिल्‍ली में ही हैं।) हालांकि मैंने सखा से कह तो दिया कि अंकल के बचने की उम्‍मीद नहीं है, लेकिन दिमाग हावी हो रहा था। हीलिंग के कारण उनकी हालत में मामूली सुधार से लग रहा था कि शायद वह स्‍वस्‍थ होकर घर जा सकेंगे। लेकिन इंट्यूशन कुछ और ही कह रहा था। काफी देर तक दिल और दिमाग में गुत्‍थम-गुत्‍थी के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि हो सकता है उनसे जुड़ाव के कारण मैं यह स्‍वीकार नहीं कर पा रहा हूं कि वह हमें छोड़कर चले जाएंगे। इससे पहले गर्मी के महीने में जब वह पांच सितारा अस्‍पताल में पहली बार भर्ती हुए थे तब एक अहसास हुआ था। डॉक्‍टर उनकी बाइपास सर्जरी करने पर आमादा थे, लेकिन मुझे यह जानलेवा लग रहा था। उस समय मैंने कहा भी था कि इनकी बाइपास सर्जरी होते मैं नहीं देख पा रहा। अगर उस समय उनकी सर्जरी होती तो बचने की उम्‍मीद बिल्‍कुल नहीं दिखी थी। हां, कुछ बातें मैंने सखा और उसके परिवार से छिपाई। उसमें से एक यह थी कि नवंबर में उनका जाना तय था। हालांकि ऐसा नहीं हुआ। उनका इन्‍तकाल दिसंबर मध्‍य में हुआ।
मैं दफ्तर में था, लेकिन ध्‍यान उन्‍हीं पर लगा हुआ था। रात को भी जब घर आया तो हीलिंग भेजने की कोशिश की। तब मैंने महसूस किया कि अंकल मुझसे पूछ रहे हैं... मिलने नहीं आओगे? अब पुख्‍़ता हो गया था कि वह नहीं रहेंगे। अगले दिन दफ्तर से सीधे रात को मैं उनसे मिलने चल पड़ा। अल सुबह अस्‍पताल पहुंचा। दिन में उनसे मिला तो एक सवाल उन्‍होंने पूछा... मैं बचूंगा कि नहीं? इस सवाल ने मुझे अंदर तक हिला दिया। वह बहुत तक़लीफ़ में थे। अगला सवाल इससे भी कहीं ज्‍यादा मार्मिक था। उन्‍होंने पूछा- क्‍या इस दर्द को बॉंध नहीं सकते? मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं इतना ही कह सका.... दूसरे कमरे में जाकर कुछ करता हूं। लेकिन मेरे किसी प्रयास का कोई नतीजा नहीं निकल रहा था। अब मुझे पूरा विश्‍वास हो गया था कि कुछ नहीं हो सकता। हालांकि घर से निकलते समय ही यह लग गया था कि हमारी यह आखि़री मुलाकात होगी। यह विचार भी आया था कि मेरे लौटने के बाद मुझे बुरी ख़बर मिलेगी। जब पूरा विश्‍वास हो गया कि अब मैं कुछ नहीं कर सकता तो खुद को लाचार जान कर वापस दिल्‍ली आने का विचार कर लिया। बुझे मन से मैं चल पड़ा। चलते समय मेरे मन में एक ही ख्‍़याल बार-बार आ रहा था। कहीं मेरी वजह से अंकल को इतनी तक़लीफ़ तो नहीं हो रही। मैंने उन्‍हें कृत्रिम तरीके से रोक रखा है। यह भाव मुझे अपराध का अहसास करा रहा था। इसी सोच-विचार में मैं करीब एक घंटे तक सड़क किनारे खड़ा रहा और किसी बस में नहीं चढ़ा। आखि़र में रात 8:30 बजे के बाद बस पकड़ी। सवाल मुझे लगातार अपराधी बना रहे थे। इसलिए करीब नौ बजे मैंने बस में ही ध्‍यान लगाया और सारी कृत्रिम व्‍यवस्‍था समेट ली। यह सोचकर कि अगर इसी कारण वह तक़लीफ़ सह रहे हैं तो अब और सहन नहीं करें। इसके बाद मुझे थोड़ी शांति मिली। रात 11:30 बजे के आसपास घर के अंदर दाखिल ही हुआ था कि मनहूस संदेश आ गया। हालांकि ख़बर पुष्‍ट नहीं थी, क्‍योंकि सखा घर पर था। उसने थोड़ी देर बाद बताया कि एक घंटा पहले पापा हमें छोड़कर चले गए।
ध्‍यान में मुझे जो कुछ दिखा था वह अक्षरश: सही साबित हुआ। मेरी जगह कोई और होता तो पता नहीं किस किस तरह के दावे करता। लेकिन मैं हीलिंग की अपनी योग्‍यता पर ही सवाल उठाता हूं, क्‍या ऐसा सम्‍भव है कि मुक्ति की ओर प्रस्‍थान कर चुके जीव को रोक दिया जाए? मेरे हिसाब से उन्‍हें दो दिन पहले ही चले जाना चाहिए था। डॉक्‍टरों का भी यही कहना था कि उनके फेफड़े फड़फड़ा रहे हैं, धड़क नहीं रहे। अंकल जिस स्थिति में थे, उस हालत में तो इनसान बेसुध हो जाता है। लेकिन उन्‍हें मैं होश में बात करते और तक़लीफ बयां करते देखा और सुना। जिस समय मैं अंकल को दी गई ऊर्जा और अन्‍य कृत्रिम व्‍यवस्‍थाएं वापस ले रहा था तब मैंने यही उम्‍मीद की थी कि ऐसा करने के बाद एक-दो घंटे भी वह मुश्किल से ही बच सकेंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो समझूंगा कि मैं बेवजह मन में भ्रम पाल रहा था। लेकिन दुखद घटना ने मुझे झुठला दिया। पर एक बात से तसल्‍ली हुई कि उन्‍हें बेरहम दर्द से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई। यदि उनकी आत्‍मा की यात्रा पूर्ण हो गई हो तब तो कोई बात नहीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ होगा तो ईश्‍वर नए जन्‍म में उनकी राह को आसान बना दे।